मैगसेसे पुरस्कार की खुशी में कुछ ज्यादा ही भारत विरोधी बातें बोल गये रवीश कुमार

देश में अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है लेकिन कुछ लोग इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने में विश्वास रखते हैं। टुकड़े-टुकड़े गैंग के प्रमुख सदस्य कन्हैया कुमार हों, शेहला राशिद हों या सिर्फ एक पक्ष की आलोचना की पत्रकारिता करने वाले रवीश कुमार हों, इन सभी के वक्तव्य ना जाने क्यों भारत विरोध की सीमा भी पार कर जाते हैं। रवीश कुमार को एशिया का नोबेल समझे जाने वाला रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार मिला जिसके लिए उन्हें देश ने बधाई दी लेकिन यह पुरस्कार लेने के लिए जब वह मनीला में आयोजित कार्यक्रम के मंच पर पहुँचे तो सिर्फ भारत विरोधी बातें ही उगलीं। अगर आप उनका पूरा भाषण सुनेंगे तो लगेगा कि यह कैसी पत्रकारिता है। जहाँ एक तरफ पूरा देश चंद्रयान-2 के पूर्ण रूप से कामयाब होने की दुआ कर रहा है, खुशियां मना रहा है तो रवीश कुमार चंद्रयान-2 मिशन पर तंज कस रहे हैं। रवीश कुमार ने कहा, ''भारत चांद पर पहुंचने वाला है, लेकिन मैं जिस चांद की बात करने जा रहा हूं, वहां गड्ढे ज़्यादा हैं, और वह किसी की मुट्ठी में बंद हो गया है। यहां रवीश का साफ निशाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर था। विदेशी धरती से भारत पर प्रहार करने वाले रवीश कुमार यहीं नहीं रूके। उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर भी सरकार को घेरते हुए कहा कि वहां कई दिनों के लिए सूचना तंत्र बंद कर दिया गया। एक करोड़ से अधिक की आबादी को सरकार ने सूचना संसार से अलग कर दिया। इंटरनेट शटडाउन हो गया। मोबाइल फोन बंद हो गए। सरकार के अधिकारी प्रेस का काम करने लगे और प्रेस के लोग सरकार का काम करने लग गए। लेकिन रवीश यहाँ यह भूल गये कि संचार सेवाओं को स्थगित करने का ही परिणाम था कि कश्मीर में अफवाहें और दुष्प्रचार फैलना बंद हुआ जिससे वहां हालात नियंत्रण में आये। मैगसेसे के जिस मंच से रवीश कश्मीर में संचार सेवाएं बाधित होने की बात कह रहे थे वहां उन्हें यह बताना चाहिए था कि कश्मीर में 90 प्रतिशत फोन सेवाएं बहाल हो चुकी हैं।रवीश ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया पर भी निशाना साधते हुए उसकी तुलना पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी से कर दी है और सलाह दी है कि दोनों का दफ्तर एक ही बिल्डिंग में होना चाहिए। यही नहीं उन्होंने अन्य भारतीय टीवी समाचार चैनलों के कंटेंट की भी खिल्ली उड़ाई और दुनिया को बताया कि आज भी भारत में कई सारे न्यूज़रूम में पत्रकारों को पर्सनल ओपिनियन लिखने की अनुमति नहीं है। रवीश ने भारत के मेनस्ट्रीम मीडिया पर भी निशाना साधते हुए कहा है कि वह पढ़े-लिखे नागरिकों को दिन-रात पोस्ट-इलिटरेट करने में लगा है और अंध-राष्ट्रवाद तथा सांप्रदायिकता उसके सिलेबस का हिस्सा हैं।लगता है रवीश कुमार को NDTV के अलावा सारा मीडिया भगवा रंग में रंगा नजर आता है तभी तो अपने भाषण में पत्रकारिता की चुनौतियों और भविष्य पर कोई प्रेरक भाषण देने की बजाय उन्होंने कहा कि ''अगर आप इस मीडिया के ज़रिये किसी डेमोक्रेसी को समझने का प्रयास करेंगे, तो यह एक ऐसे लोकतंत्र की तस्वीर बनाता है, जहां सारी सूचनाओं का रंग एक है, यह रंग सत्ता के रंग से मेल खाता है, कई सौ चैनल हैं, मगर सारे चैनलों पर एक ही अंदाज़ में एक ही प्रकार की सूचना है, एक तरह से सवाल फ्रेम किए जा रहे हैं, ताकि सूचना के नाम पर धारणा फैलाई जा सके, इन्फॉरमेशन में धारणा ही सूचना है, जिसमें हर दिन नागरिकों को डराया जाता है, उनके बीच असुरक्षा पैदा की जाती है कि बोलने पर आपके अधिकार ले लिए जाएंगे, इस मीडिया के लिए विपक्ष एक गंदा शब्द है। शायद ही किसी अन्य पुरस्कार विजेता ने अपने भाषण में अपने देश और वहां के संस्थानों पर इस तरह निशाना साधा हो।


रवीश ने देश की गलत तसवीर पेश करते हुए अपने भाषण में कहा, ''हर दिन सरकार के खिलाफ ज़ोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं, मगर मीडिया अब इन प्रदर्शनों की स्क्रीनिंग करने लगा है, इनकी अब ख़बरें नहीं बनतीं, उसके लिए प्रदर्शन करना, एक फालतू काम है। जब स्टेट और मीडिया एक होकर सिटिज़न को कंट्रोल करने लगें, तब क्या कोई सिटिज़न जर्नलिस्ट के रूप में एक्ट कर सकता है...? लेकिन यहां रवीश कुमार को यह भी बताना चाहिए था कि सरकार के खिलाफ कहां रोज प्रदर्शन हो रहे हैं। कश्मीर पर जहां लगभग पूरी दुनिया भारत सरकार के साथ खड़ी नजर आ रही है वहीं रवीश ने जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में लिये गये मोदी सरकार कै फैसले पर उंगली उठाते हुए इसे हांगकांग की घटना से जोड़ दिया। रवीश कुमार ने अपने संबोधन में कहा है कि मेनस्ट्रीम मीडिया और एक राजनीतिक दल के आईटी सेल ने उनकी छवि देशद्रोही की बना दी है। तो रवीश जी सवाल आप से ही है...इस तरह के देश विरोधी भाषण और वो भी विदेशी धरती से देने वाले व्यक्ति को क्या कहना चाहिए?