योगी के मास्टर प्लान से चित होंगी सोनिया, क्या रायबरेली भी जाएगा हाथ से ?


भारतीय लोकतंत्र के चुनावी इतिहास में कांग्रेस का सबसे बड़ा गढ़ रायबरेली। जिसने 1957 में अपने अस्तित्व में आने से लेकर 2019 के इस दौर में कुल 16 बार के आम चुनाव और दो बार लोकसभा उपचुनाव में से 15 बार कांग्रेस को ही सिर-आंखों पर बिठाया है। पहली बार फिरोज गांधी सांसद चुने गए थे। उसके बाद 1967 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की पुत्री और देश की पहली महिला प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी यहां से संसद पहुंचीं। वक्त बदला और बदलते वक्त में भी रायबरेली का मिजाज नेहरू-गांधी परिवार के साथ रहा। यहां तक कि नेहरू के भतीजे अरूण नेहरू को भी रायबरेली की जनता ने दो बार चुनकर संसद भेजा। 2004 में सोनिया गांधी ने इसे अपनी कर्मभूमि बनाया। इसके बाद लगातार वो जीत दर्ज करती आ रही हैं। 2014 के मोदी लहर और 2019 में फिर से एक बार मोदी सरकार के नारों की गूंज में भी इस सीट पर बीजेपी का कमल नहीं खिल सका। उत्तर प्रदेश में सोनिया गांधी की रायबरेली सीट ही कांग्रेस के लिए सबसे सुरक्षित मानी जाती रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने यहां बहुत खराब प्रदर्शन करते हुए भी 1 लाख के अंतर से बीजेपी प्रत्याशी दिनेश सिंह को हराया है। लेकिन पिछली बार की तुलना में कांग्रेस की जीत का अंतर घट गया है। दरअसल, कांग्रेस की हालत यहां पर 2017 में हुए विधानसभा चुनाव से ही खराब होती दिख रही थी। लोकसभा क्षेत्र में पांच विधानसभा सीटें हैं जिनमें से दो कांग्रेस, दो बीजेपी और एक समाजवादी पार्टी के पास थी। जिसके बाद कांग्रेस के दिग्गज नेता और गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले दिनेश सिंह और उनके परिवार को भाजपा ने अपने साथ मिला लिया और लोकसभा चुनाव में सोनिया के खिलाफ ही उतार दिया। दिनेश सिंह के छोटे भाई अवधेश सिंह रायबरेली की हरचंदपुर सीट से कांग्रेस विधायक हैं। उनके बड़े भाई के बीजेपी में जाने के बाद वे भी बीजेपी के साथ ही माने जा रहे हैं। लेकिन सारी कवायदों के बाद भी सोनिया को मात नहीं दे पाने के पीछे एक बड़ी वजह थी कि कांग्रेस के पास मौजूद था एक तुरुप का पत्ता जो जिले के सभी बाहुबलियों पर अकेले ही भारी पड़ता रहा था। रायबरेली सदर से पूर्व विधायक और बाहुबली नेता अखिलेश सिंह। अखिलेश सिंह का इलाके में प्रभाव इतना ज्यादा था कि 2004 में सोनिया गांधी रायबरेली सीट से चुनाव लड़ने आईं तो अखिलेश सिंह ने अपने चचेरे बड़े भाई अशोक सिंह को मैदान में उतारकर कांग्रेसी नेताओं को परेशान कर दिया था। प्रियंका गांधी 2004 में अपनी मां सोनिया गांधी के चुनाव प्रचार के लिए अखिलेश सिंह के इलाके से गुजरीं तो सड़कें सूनी पड़ी थीं और दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था। इसके बाद प्रियंका गांधी ने रायबरेली में डेरा जमा दिया था, जिसके बाद कहीं जाकर सोनिया कड़ी मशक्कत के बाद जीत पाई थीं। जिसके बाद अखिलेश की कांग्रेस में फिर से वापसी होती है। उसी बाहुबली नेता की बेटी हैं रायबरेली सदर की विधायक अदिती सिंह जिनका नाम इन दिनों यूपी की राजनीतिक सुर्खियों में है। अदिती के पिता अखिलेश सिंह अवध के सबसे बड़े नेताओं में से एक माने जाते थे। 20 अगस्त को उनका निधन हो गया। इससे पहले उन्होंने 370 पर मोदी सरकार के फैसले का समर्थन किया था और कांग्रेस के स्टैंड पर भी सवाल उठाए थे। कांग्रेस की भाषा को पाकिस्तान की भाषा बताया था। जिसके बाद से ही यह कयास लगाए जाने लगे थे कि अदिती सिंह भाजपा में शामिल हो सकती हैं। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। लेकिन 2 अक्टूबर 2019 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर यूपी सरकार द्वारा बुलाए गए विशेष सत्र में कांग्रेस, सपा और बसपा ने रिकार्ड बनाने के मकसद से सत्र के बुलाए जाने की बात करते हुए इसके बहिष्कार का ऐलान कर दिया था। लेकिन रायबरेली सदर से विधायक अदिती सिंह पार्टी लाइन से हटकर इस सत्र में शामिल हुईं और कई अहम मुद्दों पर भाषण भी दिया। इस दौरान अदिती सिंह ने केंद्र की बीजेपी सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने का समर्थन भी किया। जिसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अदिति की तारीफ भी की। दरअसल, अब बीजेपी अदिति सिंह में मिशन रायबरेली देख रही है। जिसके जरिए वह गांधी परिवार के इस गढ़ को ढहाने की रणनीति तैयार कर रही है। स्मृति ईरानी के अथक प्रयासों के बाद भाजपा ने कांग्रेस और गांधी परिवार से अमेठी छीन लिया जिसके बाद से ही भाजपा की नजर गांधी परिवार के दूसरे गढ़ में सेंध लगाने की है। जिसके लिए उसे मोहरा मिल भी गया है। अब इसे मात्र संयोग कहें या कुछ और कि अदिती के योगी के विशेष सत्र में शामिल होने के अगले ही दिन योगी सरकार की तरफ से उन्हें वाई श्रेणी की सुरक्षा दे दी गई। हालांकि अदिती ने इस सुरक्षा प्रदान किए जाने के पीछे मई महीने में उन पर हुए हमले को वजह बताया है।बता दें कि बाहुबली नेता अखिलेश सिंह की मृत्यु के बाद से ही उनके प्रतिद्वंदी अदिती सिंह पर हावी होने की कोशिश में दिखे और बीते दिनों रायबरेली लखनऊ रोड पर अदिति सिंह पर एक कथित हमले की भी घटना हुई। इस घटना के बाद अदिति सिंह को भी समझ आ गया कि जिले के बदलते समीकरणों के बीच जिले की राजनीति को दिल्ली के नेताओं को भरोसे नहीं चलाया जा सकता है। नतीजतन 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन लखनऊ में प्रियंका गांधी की अगुवाई में कांग्रेस के मार्च और पार्टी व्हिप को दरकिनार कर अदिती ने प्रदेश की योगी सरकार के विशेष सत्र में जाना जरूरी समझा। ऐसे में रायबरेली के बदलते समीकरण और अदिति सिंह की बीजेपी से बढ़ती नजदीकियां गांधी परिवार के एक मात्र बचे दुर्ग को ढहा सकती है, जिसके लिए बीजेपी लगातार प्रयासरत भी है।